तालाब और नदियों में उगने वाले खरपतवार जलकुंभी से ज्यादातर लोग परेशान रहते हैं, क्योंकि इन्हें जितना हटाया जाता है, उतनी तेजी से ही बढ़ती जाती हैं। ऐसे में वैज्ञानिकों ने इससे वर्मी कम्पोस्ट बनाकर इन्हें काम का बनाना शुरू कर दिया है।
बिहार कृषि विश्वविद्यालय, साबौर के वैज्ञानिक जलकुंभी से वर्मी कम्पोस्ट बना रहे हैं और किसानों को भी जलकुंभी से वर्मी कंपोस्ट बनाना सिखा रहे हैं।
बीएयू के कृषि वैज्ञानिक डॉ. एससी पॉल कहते हैं, “जलकुंभी को जितना हटाएंगे उतना ही बढ़ेगा, पानी में जितनी जगह मिलेगी वहां उतना ही फैलता जाएगा, लेकिन इसे काम का कैसे बनाना है लोग नहीं जानते हैं।”
डॉ. पॉल पहले वर्मी कम्पोस्ट और कम्पोस्ट में अंतर समझाते हैं, “देखिए दो तरह के कम्पोस्ट होते हैं, कम्पोस्ट और वर्मी कम्पोस्ट, कम्पोस्ट गोबर और खरपतवार से बनाते हैं, जिसमें गोबर और पत्तियों को गीला करके ढक देते हैं, जो तीन महीने में सड़कर कम्पोस्ट बन जाता है, इसे ही कम्पोस्ट कहते हैं।”
वो आगे बताते हैं, “जबकि वर्मी कम्पोस्ट भी इसी गोबर और खरपतवार से बनता है, लेकिन वो केचुएं की मदद से बनता है। केंचुआ इन्हें खाकर मल त्यागता है जो वर्मी कम्पोस्ट कहलाता है। इन दोनों में यही अंतर है, जैसे कि कम्पोस्ट और खरपतवार से सड़कर कम्पोस्ट बनाते हैं, उसमें भी न्यूट्रिएंट्स होते हैं, लेकिन वही जब केंचुए से बनाते हैं तो उसमें न्यूट्रिएंट्स तो वही रहेंगे, लेकिन इसमें यही अंतर है कि इसमें केंचुए के जरिए बहुत सोर दूसरे लाभदायक एंजाइम, एंटीबॉयोटिक भी मिल जाते हैं, जोकि पौधे के लिए जरूरी होते हैं। इस तरह हम कह सकते हैं कि कम्पोस्ट में अगर 0.5% नाइट्रोजन है तो वही नाइट्रोजन वर्मी कम्पोस्ट में बढ़कर 0.7% हो जाएगा।”
कम्पोस्ट और वर्मी कम्पोस्ट में अंतर समझने के बाद अब बारी आती है, जलकुंभी से कैसे वर्मी कम्पोस्ट बना सकते हैं। डॉ पॉल समझाते हैं, “पहले जलकुंभी से पानी से निकालते हैं और आप लेबर कर सकते हैं तो उसकी जड़ें काटकर निकालवा दें, ऊपर के हरे हिस्से को रख सकते हैं। अगर चाहे तो जड़ के साथ भी रख सकते हैं, लेकिन इसमें ज्यादा समय लगता है। क्योंकि केचुएं जड़ को नहीं खाते।”
आगे की प्रक्रिया के बारे में बताते हैं, “जलकुंभी को पहले सुखाते हैं तब हरा रंग भूरे रंग में बदल जाता है, इसे इसलिए सुखाते हैं क्योंकि अगर इसे ऐसे ही रख देते हैं तो यह सड़कर बदबू करने लगता है और गर्मी के कारण केंचुए को भी नुकसान हो सकता है। इसलिए इसे सुखाते हैं। सुखाकर रखे गए जलकुंभी में गोबर भी मिलाते हैं, क्योंकि जलकुंभी अकेले केंचुए नहीं खाते हैं इसीलिए गोबर मिलाया जाता है।”
लेकिन किसान सीधे ऐसे ही गोबर नहीं डाल सकते हैं, इसकी अलग प्रक्रिया होती है। डॉ पॉल ने बताया, “गोबर को ऐसे ही डाल नहीं सकते हैं, इसके लिए गोबर में पानी मिलाकर उसका घोल यानी स्लरी बनायी जाती है। क्योंकि जलकुंभी सूख जाती है तो इसे गोबर में अच्छी तरह मिलाना होता है, लेकिन अगर सूखे गोबर में मिलाएंगे तो अच्छे से नहीं मिलेगा, लेकिन अगर उसे स्लरी बनाकर मिलाते हैं तो बढ़िया से दोनों मिल जाते हैं। फिर इसे अच्छी तरह से मिलाकर, जिसके पास टैंक की सुविधा है तो उसमें रख सकते हैं नहीं तो मिट्टी के ऊपर भी इकट्ठा करके रख सकते हैं। लेकिन इसे जूट के बोरे से जरूर ढ़क दें, नहीं तो घासफूस या फिर सूखी हुई जलकुंभी भी डाल सकते हैं।”
किसानों के मन में अक्सर सवाल आता है कि वर्मी कम्पोस्ट के लिए कौन सा केंचुआ सही होता है। डॉ. एसी पॉल कहते हैं, अब इसके चार पांच दिन बाद उसमें केंचुए डालने होंगे, लेकिन केंचुए डालते समय भी ध्यान रखना होगा कि कौन सा केंचुआ डाल रहे हैं।”
“एक केंचुआ होता है यूड्रिलस यूजिनी (Eudrilus eugeniae)और दूसरा केंचुआ होता है आइसेनिया फेटिडा (Eisenia fetida), ये दोनों केंचुए वर्मी कम्पोस्ट बनाने के लिए बढ़िया होते हैं। केंचुए को डालने के बाद चार-पांच दिन में थोड़ा-थोड़ा पानी छिड़कते रहें, क्योंकि केंचुए नर्म चीजे खाते रहेंगे, इसलिए नर्मी बनाए रखें। इस तरह तीन महीने में वर्मी कम्पोस्ट तैयार हो जाती है, “उन्होंने बताया।
अगर किसान को ये दोनों केंचुए न मिले तब क्या किसान कम्पोस्ट नहीं बना सकते? डॉ पॉल इसका की प्रबंध बनाते हैं, “अगर केंचुआ नहीं मिल रहा है तो एक दूसरा भी तरीका है, केले के तने को काटकर कहीं छाया में मिट्टी में रख दें, एक-दो महीने में देखेंगे की केले के तने में कुछ लाल रंग के केंचुए घुस गए हैं, उन्हें चुनकर हम वर्मी कम्पोस्ट के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं, लेकिन इसमें ज्यादा समय लगता है। क्योंकि केंचुए जितने ज्यादा रहेंगे उतनी जल्दी ही बनेगा।”
इसमें एक बात और ध्यान रखना होगा गोबर की मात्रा सही रखनी होगी, नहीं तो केंचुए खाना छोड़ देते हैं और अच्छी तरह से कम्पोस्ट नहीं बनती है।
किसान वर्मी कम्पोस्ट को खेत में इस्तेमाल करने के साथ ही बेच भी सकते हैं। डॉ. एससी पॉल बताते हैं, “जलकुभी से किसान वर्मी कम्पोस्ट बनाकर खेत को उपजाऊ बनाने के साथ ही बेचकर भी कमाई कर सकते हैं, यहां विश्वविद्यालय में हम आठ रुपए किलो वर्मी कम्पोस्ट बेच रहे हैं।”